
कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका: अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े एक बड़े कानूनी मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। वर्ष 2024 में हुए एक प्रो-फिलिस्तीनी छात्र प्रदर्शन के बाद जिन पांच छात्रों पर आरोप लगाए गए थे, उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे में जज ने “मिस्ट्रायल” घोषित कर दिया है।
मिस्ट्रायल का अर्थ होता है कि जूरी (जूरी सदस्य) किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी, इसलिए मुकदमे को कानूनी रूप से दोबारा चलाया जा सकता है।
यह फैसला सिर्फ पांच छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका में छात्र आंदोलनों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन की सीमाओं पर एक बड़ी बहस को जन्म दे रहा है।
पूरा मामला क्या है?
यह घटना 5 जून 2024 की है, जब स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में अंतिम परीक्षा का दिन था। इसी दिन कुछ छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ प्रो-फिलिस्तीनी विरोध प्रदर्शन किया।
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना था कि यूनिवर्सिटी को उन कंपनियों और संस्थाओं से अपने निवेश वापस लेने चाहिए जो इज़राइल-गाजा संघर्ष से जुड़ी गतिविधियों में शामिल हैं।
इस विरोध के तहत कुछ छात्र यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट और प्रोवोस्ट के कार्यालय में घुस गए और वहां बैठकर प्रदर्शन करने लगे।
प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ?
प्रॉसिक्यूशन (सरकारी वकील) के अनुसार, छात्रों ने प्रदर्शन के दौरान कई ऐसी गतिविधियां कीं, जिन्हें गैरकानूनी और तोड़फोड़ की श्रेणी में रखा गया।
आरोपों के अनुसार:
- दीवारों पर स्प्रे पेंट से नारे लिखे गए
- खिड़कियों और फर्नीचर को नुकसान पहुंचाया गया
- सुरक्षा कैमरों को खराब किया गया
- फर्श पर लाल रंग का तरल फैलाया गया, जिसे प्रतीकात्मक रूप से “खून” बताया गया
यूनिवर्सिटी प्रशासन का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम में लगभग 3 लाख डॉलर (करीब 2.5 करोड़ रुपये) की संपत्ति को नुकसान हुआ।
छात्रों का पक्ष क्या है?
छात्रों के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि यह प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा था।
उनका कहना था कि:
- छात्रों का उद्देश्य तोड़फोड़ करना नहीं था
- यह विरोध केवल नैतिक और राजनीतिक संदेश देने के लिए किया गया था
- छात्रों ने किसी प्रकार की हिंसा नहीं की
डिफेंस वकीलों ने यह भी कहा कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्रों पर अत्यधिक सख्त आपराधिक धाराएं लगाईं, जबकि यह मामला छात्र आंदोलन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।
अदालत ने मिस्ट्रायल क्यों घोषित किया?
करीब तीन सप्ताह तक चले ट्रायल और पांच दिन की जूरी चर्चा के बाद भी जूरी सदस्य किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंच सके।
जूरी की वोटिंग इस प्रकार रही:
- तोड़फोड़ (Vandalism) के आरोप पर: 9 बनाम 3
- अवैध प्रवेश और साजिश (Conspiracy to trespass) के आरोप पर: 8 बनाम 4
चूंकि अमेरिका की न्याय प्रणाली में सर्वसम्मति आवश्यक होती है, इसलिए जूरी का फैसला अमान्य माना गया।
इसके बाद जज हैनली च्यू ने औपचारिक रूप से इस केस को मिस्ट्रायल घोषित कर दिया और जूरी को भंग कर दिया।
आगे क्या होगा?
सांता क्लारा काउंटी के डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी जेफ रोसेन ने स्पष्ट किया कि सरकार इस मामले को दोबारा अदालत में ले जाएगी।
उन्होंने कहा:
“राजनीतिक विचार चाहे जो भी हों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना कानूनन अपराध है। कानून सबके लिए समान है।”
मतलब यह कि छात्रों पर लगे आरोप दोबारा कोर्ट में पेश किए जाएंगे और पूरा मुकदमा फिर से चलेगा।
छात्रों को कितनी सजा हो सकती है?
यदि भविष्य में होने वाले मुकदमे में छात्र दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें:
- 3 साल तक की जेल
- भारी जुर्माना
- यूनिवर्सिटी संपत्ति के नुकसान की भरपाई
जैसी सजा हो सकती है।
हालांकि, छात्रों के वकीलों का मानना है कि वे दोबारा भी अपने मुवक्किलों को निर्दोष साबित करेंगे।
पहले कितने छात्र गिरफ्तार हुए थे?
इस पूरे मामले में शुरुआत में कुल 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
बाद में:
- कुछ छात्रों ने प्ली डील (दोष स्वीकार कर हल्की सजा लेना) स्वीकार की
- कुछ ने डायवर्जन प्रोग्राम अपनाया
- केवल 5 छात्रों ने पूरा मुकदमा लड़ने का फैसला किया
यही पांच छात्र इस केस का मुख्य केंद्र बने हुए हैं।
अमेरिका में छात्र आंदोलन और यह मामला क्यों अहम है?
2024 में इज़राइल-गाजा युद्ध के बाद अमेरिका की कई यूनिवर्सिटियों में प्रो-फिलिस्तीनी प्रदर्शन हुए।
इन प्रदर्शनों में छात्रों ने:
- निवेश नीति बदलने
- हथियार कंपनियों से दूरी बनाने
- मानवाधिकारों का समर्थन करने
जैसी मांगें रखीं।
लेकिन कई जगहों पर इन प्रदर्शनों के कारण टकराव, गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई भी हुई।
स्टैनफोर्ड का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह छात्र स्वतंत्रता बनाम कानून व्यवस्था की बहस को उजागर करता है
- यह तय करेगा कि कैंपस में विरोध की सीमाएं क्या होनी चाहिए
- यह आने वाले समय में छात्र आंदोलनों के लिए कानूनी दिशा तय करेगा
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम कानून
इस केस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि:
“क्या विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना जायज़ है?”
कुछ मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि:
- सरकार छात्रों पर अत्यधिक कठोर धाराएं लगा रही है
- इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाई जा रही है
वहीं प्रशासन का मानना है कि:
- विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए
- कानून तोड़ना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं
छात्रों और समर्थकों की प्रतिक्रिया
मिस्ट्रायल की घोषणा के बाद छात्रों और उनके समर्थकों ने इसे आंशिक जीत बताया।
उनका कहना है कि:
- यह फैसला साबित करता है कि मामला स्पष्ट नहीं है
- सरकार छात्रों को डराने की कोशिश कर रही है
- आंदोलन जारी रहेगा
कई छात्र संगठनों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में फिर से समर्थन प्रदर्शन भी किए।
यूनिवर्सिटी प्रशासन की स्थिति
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस फैसले के बाद बयान जारी करते हुए कहा कि:
- वे कानून का सम्मान करते हैं
- यूनिवर्सिटी परिसर में अनुशासन बनाए रखना जरूरी है
- विरोध की अनुमति है, लेकिन तोड़फोड़ नहीं
आगे क्या असर पड़ेगा?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस केस का असर:
- अमेरिका की अन्य यूनिवर्सिटियों की नीतियों पर पड़ेगा
- छात्र आंदोलनों के नियमों को और सख्त किया जा सकता है
- कैंपस में प्रदर्शन की सीमाएं तय की जाएंगी
निष्कर्ष (Conclusion)
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों के खिलाफ चल रहा यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी, छात्र आंदोलन और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन का प्रतीक बन गया है।
मिस्ट्रायल घोषित होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले समय में यह केस अमेरिका के छात्र आंदोलनों की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है।